यह लेख सतीश मालवीय द्वारा लिखा गया है, और ‘मूविंग अपस्ट्रीम: लूणी फेलोशिप प्रोग्राम’ के अंतर्गत की गई लूणी नदी पदयात्रा के अनुभवों पर आधारित है। कृपया ध्यान दें की इस लेख को पढ़ने में क़रीब २० मिनट का समय लगेगा (लेख के साथ ढेर सारे रोमांचक चित्र भी शामिल हैं)
कवर फोटो: गोलिया कलां और धांधलावास गांव के बीच नदी पार करती महिला और बच्चे।
यह कहानी एक ऐसी नदी की कहानी है जो सबसे अलग है, यह न मीठा पानी लिए बहती है, ना ही किसी महासागर से मिलती है, फिर भी समाज, संस्कृति और पर्यावरण की दृष्टी से अपना एक अलग महत्त्व रखती है।
परिचय
नदियाँ और जल धारायें मुझे हमेशा आकर्षित करती रही हैं और मेरी जिज्ञासा का कारण भी रही हैं। मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में, बेतवा नदी के किनारे हुआ। मैं पला बढ़ा भी मध्यप्रदेश में, बेतवा के आसपास के शहरों में। काम के सिलसिले में बेतवा, केन, नर्मदा जैसी नदियों की लंबी यात्राएँ की। इनमें से कई पैदल भी की पर ये यात्राएँ स्वयं से आयोजित और नियंत्रित थी। इनमें कभी-कभी पड़ाव भी निश्चित नहीं होते थे।
पर मेरा मानना है कि, बिना अनिश्चितता के यात्री में यात्रीपना नहीं आ पाता। इस दृष्टी से लूणी की यात्रा जिज्ञासाओं से भरी हुई थी। वह एक नए क्षेत्र और उसके लोगों को देखने, समझने और अनुभव करने की एक अनोखी यात्रा थी।
घूमकड़ी और खानाबदोशी मेरे पेशे का एक हिस्सा है, इसलिए जब भी यात्रा का जिक्र आता है मेरे मन में आनंद का एक झरना सा फुट पड़ता है। इस झरने का पानी अक्सर मीठा होता है। फिर भले ही वह यात्रा खारे पानी वाली मारवाड़ की गंगा, लूणी की ही क्यों न हो। अजमेर के पास, अरावली की नागा पहाड़ियों से निकलने वाली यह नदी, 495 किलोमीटर लंबी दुरी तय करके कच्छ के रण में विलीन हो जाती है।

यात्रा
तो करीब दो महीनों तक स्थानिक नक्शों का अध्ययन करने और आवश्यक जानकारियां जुटाने के बाद, मैं अपनी लूणी की यात्रा पर निकला। निकलते वक्त मन में कुछ नया करने और देखने की एक मीठी सी सिहरन सी थी। लगभग 48 घंटे का सफ़र तय करके 31 जनवरी को मैं बखासर पहुंचा।
बखासर के लिए बस बालोतरा और गुड़ामालानी होकर गुजरती है। बालोतरा से निकली बस लूणी नदी के अंदर से ही गुजरी, हालाँकि नदी पर पुल बना हुआ था, फिर भी। लेकिन नदी से गुजरते वक्त भी हमें यह पता ही न चला कि हम जिस कच्चे रास्ते से गुजर रहें हैं वह लूणी है!
यह क्षेत्र बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैंने सोचा था – सूखा, धूल भरा और बंजर। ऐसा लग रहा था कि, जैसे हम थार के करीब है। वहाँ बमुश्किल कोई पेड़ था और पानी का तो दर्शन भी नहीं हो रहा था। मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि, ऐसी परिस्थितियों में भी इस क्षेत्र की एकमात्र नदी, लूणी जीवित रह सकती है।

लेकिन गुड़ामालानी के गुजरते ही हमारी आँखों के सामने का दृश्य अचानक बदल गया। यहाँ चारों ओर दूर-दूर तक हरे-भरे खेत दिखने लगे, मानो हम किसी मरू उद्यान में आ गए हो। यहीं लूणी में हमें पहिली बार जल दर्शन हुआ, जो किसी सुखद आश्चर्य से कम न था। यहीं से हमारी यात्रा सही मायने में शुरू हो चुकी थी।
यह इलाका बॉर्डर के करीब होने से बस बखासर से आगे नहीं जाती। दक्षिणी राजस्थान के इस गाँव से पाकिस्तान की सीमा बस कुछ किलोमीटर दूर है। देश की सीमा के इतने करीब आना सचमुच एक अलग अनुभव था।
एक सुंदर शुरुआत
बखासर पहुंचते पहुंचते शाम हो गई। यहाँ सरपंच भँवरलाल जी हमें लेने आये। उनका घर गांव से दूर था, खेतों और रेत के टीलों के बीच। भंवरलाल जी का एक ख़ुशहाल संयुक्त परिवार है, जिसमें तीन बेटे-बहुएँ और कई सारे पोते–पोतियाँ हैं।
दलित समाज से आने वाले भँवरलाल जी बहुत ही नेक और सरल व्यक्ति हैं। हम अजनबी अथितियों की उन्होंने बहुत ही अपनेपन से मेजबानी की। सफर में आगे किस तरह जाति से जुड़े सवालों एवं दुर्भाव का सामना करना पड़ेगा तथा जाति के आधार पर आश्रय खोजने में कितनी मुश्किलें आएँगी, इस बात से भी उन्होंने हमें अवगत कराया।
भँवरलाल जी के घर में दो टांके थे। लेकिन इनमें पानी खरीद कर भरना पड़ता था। खेत में दो बेरियां भी थी पर उनका पानी भी पीने योग्य नहीं था। उन्होंने हमें बताया कि, इस क्षेत्र में 40 फीट से 160 फीट तक पानी तो लग जाता है, पर वो खारा होता है। पहले यहाँ सभी किसानों के पास गहराई से पानी निकालने के साधन नहीं थे, पर अब साधन भी हैं और नहर (जो गुजरात की नर्मदा नदी से आती है) का पानी भी आ गया है।
भंवरलाल जी के घर में केसरी फूलों से लदा एक रोहिड़ा का पेड़ था (रोहिड़ा राजस्थान का राज्य पुष्प है)। ये पेड़ मुझे किसी साधु सा, शांत और विनम्र लग रहा था। मैं अपना ये सफर इसी पेड़ की भांति शांत चित और स्थिर मन के साथ शुरू करना चाहता था और पुरे सफर के दौरान मन की यही स्थिति बनाए रखना चाहता था।
बखासर की सुबह मेरे जीवन की सबसे सुंदर सुबह थी! जीरे के हरे भरे खेतों के पार, पूर्व दिशा में, कोहरे के बीच से रक्तिम लालिमा ओढ़े सूर्योदय हो रहा था। आम तौर पर यहाँ कोहरा नहीं पड़ता परंतु आज कोहरा था। इस कोहरे ने इस सुदूर गांव के सूर्योदय को इतना खूबसूरत बना दिया था कि, लग रहा था, मानो प्रकृति साक्षात हमारे स्वागत के लिए बखासर आई हो!

नेहड़ में आपका स्वागत है
1 फरबरी की सुबह हम अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़े। स्थानीय लोक परिवहन की जर्जर बस से कच्चे रास्ते पर खेजड़ियाली गांव की तरफ।
रास्ते में एक जगह बहुत सा पानी दिखाई दिया, लगा यही लूणी नदी है। पर नहीं, ये 2023 के बिपरजॉय तूफान में हुई भारी बारिश के कारण जमा हुआ पानी था, जो अब खारा हो गया था। यात्रा की तैयारी के दौरान मैंने गूगल मैप और गूगल अर्थ पर इस पुरे प्रदेश में इस तरह के कई स्पॉट्स देखे थे, जो शायद कभी नमक के मैदान रहे होंगे। इनके आसपास बड़ा बंजर इलाका होता है। यहाँ लोग इसे खार या खरड़ कहते हैं। इस वक्त भी मेरे सामने एक ऐसी ही झील थी, जो करीब एक किलोमीटर चौड़ी और 7-8 किलोमीटर लंबी होगी।
हमने रास्ते में लूणी नदी को पार किया। उसमे एक पतली धारा चल रही थी। नदी के किनारे दलदल थी और उसके आसपास बड़े बड़े सूखे, बंजर मैदान थे, जिनमें नमक की हल्की सफ़ेद परत बिछी हुई थी। हम खेजड़ियाली गांव पहुंचें। नाम से पहले जाति पूंछने वाले इस इलाके को नेहड़ कहा जाता है। नेहड़ का मतलब है दलदल भरा, रेतीला और खारा क्षेत्र। तो नेहड़ में आपका स्वागत है।
रूपांतरित लूणी
खेजड़ियाली: रेगिस्तान में बसा एक हरा-भरा गाँव

रेगिस्तान में बसे इस हरे-भरे गाँव को देखकर हम आश्चर्यचकित हो गए, फिर पता चला 20 साल पहले यह ऐसा नहीं था।
खेजड़ियाली में हमारे मेजबान थे पराग सिंह। पराग सिंहजी उम्र कुछ 55 साल होगी। वे पूर्व सरपंच और पुराने जागीरदार हैं, शराब की ठेकेदारी करते हैं, और 100-150 बीघा खेती है। उनके घर में उनकी पत्नी, दो बेटे, एक बहु तथा एक पोता और एक पोती ऐसे सात सदस्य हैं। बड़ा बेटा कीटनाशक और फ़सल बीजों का दुकानदार है तो छोटा बेटा प्राइवेट स्कूल मे टीचर। पराग सिंह के खानदान के दूसरे लोग भी इसी गांव मे अलग अलग घरों मे रहते हैं।
पराग जी ने हमें बताया कि, 2008 में यहाँ नहर से नर्मदा का पानी लाया गया। उससे पहले इस इलाके में कुछ भी नहीं था, केवल एक खरीफ की फ़सल ली जाती थी।
नहर के पानी ने यहाँ के किसानों की जिंदगी बदल दी। पानी की उपलब्धता के कारण यहाँ के किसान अब जीरा, गेहूँ, रायड़ा, और आरंडी जैसी फसलें ले रहे हैं और उनकी आय भी अच्छी खासी बढ़ गई है।
केवल खेती ही नहीं बदली, लूणी भी बदल गई
1979 में आई एक भीषण बाढ़ के कारण लूणी ने अपना मार्ग बदल लिया, जिससे नई लूणी और पुरानी लूणी का निर्माण हुआ।

पर खेजडियाली के पास बहने वाली नई लूणी में लंबे समय तक बारिश न होने से पानी का प्रवाह सूख गया। कभी-कभार थोड़ी बारिश आने से नदी में पानी आया भी, तो भी अधिकांश काल यह सूखी ही रही।
पिछले 10 वर्षों मे लूणी में तीन बार बाढ़ आई। नहर का पानी छोड़ने से नई लूणी के प्रवाह में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, जबकि पुरानी लूणी का प्रवाह पुरी तरह सूख गया, जिससे लोग उस पर खेती करने लगे। रेगिस्तान की नदियाँ समय-समय पर अपना रास्ता बदलती रहती हैं। रास्ता बदलना उनका स्वभाव होता है।
यहाँ के किसानों ने हमें बताया कि, आज लूणी में जो पानी है, वह नहर और गांधव पर टूटे नहर के ओवरफ्लो से आया हुआ नर्मदा का पानी है।

एक अजीब तरीके से नर्मदा को लूणी से जोड़ दिया गया है।
किसानों की बातों से यह भी पता चला कि, उन्हें फ़सल सिंचाई के लिए पानी नहरों से ही मिलता है। नदी में इस तरह पानी बहना उन्हें व्यर्थ लगता है, क्योंकि वह बहकर पाकिस्तान चला जाता है।
नर्मदा का पानी सिर्फ सिंचाई के सीजन में ही आता है, बाद में रुक जाता है और धीरे-धीरे खारा हो जाता है। इस खारे पानी से यहाँ के दर्जनों गाँवों के खेत दलदल और खारे बंजर हो गए हैं। यहाँ की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थिति ज्यादा पानी के लिए अनुकूल नहीं है। परंतु यह संतुलन बिगड़ने से, इस क्षेत्र में सूक्ष्म पारिस्थितिक परिवर्तन हो रहें हैं और यहाँ की जैव विविधता धीरे-धीरे नष्ट हो रही है।
किसानों का कहना है कि, इस इलाके में पानी बढ़ने से खार भी बढ़ा है। दूसरी ओर, इन नहरों के आने से और लूणी के बदलने से पीने के पानी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। नहर और ओवरफ्लो का पानी सिर्फ सिंचाई के लिए उपयोग में आता है।

पराग सिंह बताते हैं कि, पहले पीने का पानी गांव की टंकी में पाइप लाइन से आता था। पर वह व्यवस्था बहुत दिन पहले ही बंद हो गई। अब पीने का पानी टैंकर से मंगवाना पड़ता हैं।
लूणी को और भी अधिक बदलने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं।
पराग सिंह हमसे जानना चाहते थे कि, हम नदी का सर्वे करने आये हैं, तो क्या यहाँ ड्राई पोर्ट बनने वाला है? क्योंकि कुछ साल पहले यहाँ कुछ लोग नदी का सर्वे करने आये थे और नदी किनारे पीलर भी लगा कर गए थे।
वे शायद 2016 में Inland Waterways Authority of India द्वारा किए गए सर्वेक्षणों की बात कर रहे थे।
उन्होंने लूणी नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग बनाने के लिए सर्वेक्षण किया था – ताकि जहाज और नावें कच्छ के रण से भवतरा ड्राय पोर्ट आ-जा सकें।सर्वेक्षण में पाया गया कि, लूणी पर जल राजमार्ग बनाने के लिए भारी मात्रा में रेत खोदनी होगी। हालाँकि नदी को बदलने की इन योजनाओं पर कोई प्रगति नहीं हुई है।
लूणी के लोग




लोगों से मिलना जुलना, उनसे बातचीत करना मेरा पेशा और स्वभाव दोनों ही है। खेजड़ियाली में हमें कोई परेशानी नहीं हुई। हमने यात्रा शुरू की, कई लोगों से बातचीत की, पर यहाँ नदी के किनारे पर दलदल और कंटीले पेड़ थे तो हम नदी से सटकर नहीं चल सके। हमें कुछ दुरी पर सड़क के सहारे चलना पड़ा।
मुझे अगले 14 दिन चलना था। पर मेरे मन में अगले 14, 13 या 12 दिन का कोई खयाल नहीं था, न ही किसी दिन के लिए मैंने कोई योजना बनाई थी, मैं बस नदी के साथ चलना चाहता था, जहाँ से वो मुड़ती वहाँ से मुड़ना चाहता था। उसके आसपास उपजी वनस्पतियों और फसलों को देखना चाहता था, नदी के पुरे भूगोल को समझना चाहता था। नदी के किनारे से दूर चल कर यह सब नहीं हो सकता था।
सुराचंद से पहले सुथड़ी गांव के चौराहे पर कुछ रबारी महिलायें दिखी। वे काली चुनरी वाले, राजस्थानी पोशाख में थी और आपस में एक-दूसरे का हाथ चुम कर अभिवादन कर रही थीं। इस तरह से अभिवादन की प्रथा इस इलाके में हमें पहले कहीं नहीं दिखी। हम अगर रबारियों का इतिहास और संस्कृती देखें तो हमें बहुत सारी रोचक बातें जानने को मिलेंगी। आज रबारी समुदाय अपनी आजीविका और संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। रबारी समुदाय की आजीविका का स्त्रोत पशुपालन है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती सूखे की घटनाओं का इस भूमिहीन समुदाय पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।
जहाँ से हमने अपना सफ़र शुरू किया, वह लूणी का किनारा पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की दृष्टी से तो संवेदनशील है ही, साथ ही सांस्कृतिक विविधता से भी ओतप्रोत है।
आजादी के समय पाकिस्तान से आये कई परिवार जिनके नाम के आगे बलौच उपनाम प्रयोग होता था मुस्लिम समुदाय से होने के बाबजूद भी यहाँ घुल मिल कर रहे थे, हाजी इस्माइल मीर खान जैसे बुजुर्ग मिले जिनका नाम पाकिस्तान के सिंध और भारत के कच्छ में स्थित कई सूफ़ी संतों से मेल खाता था।
अपने पुत्र कि मृत्यु के बाद अपने घर के आँगन में छोटा सा मंदिर बनाने वाला पिता, आजीविका के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने परिवार और मवेशीयों के साथ घूमने वाले परिवार, पानी आने से फिर से खेती करने अपने गांव लौटे प्रवासी मजदूर, सरकारी नौकरी और रोजगार की तलाश में जुटे हताश युवक… नदी किनारे चलते हुए, गाँवो में लोगों से बातचीत के दौरान हमें ऐसी अनगिनत कहानियां मिली। इन कहानियों के अपने सामजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संदर्भ थे जिनका विस्तार से विश्लेषण किया जा सकता है। लेकिन इस लेख में उन सब के बारे में लिखना संभव न हो पाएगा।
राजस्थान पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है लेकिन राजस्थान का यह क्षेत्र पर्यटन से एकदम अछूता है। हम कई गाँवों से गुजरे। इन गाँवों में पुराने मकान कम थे और नए मकान ज्यादा बन रहे थे। बड़े आँगन वाले मकान दो हिस्सों में बटे थें, रसोई और महिलाओ का एक हिस्सा और पुरुषों का दूसरा हिस्सा। पुरुषों वाला हिस्सा आँगन के दूसरी तरफ या सामने कि तरफ होता था। पुरुष रिश्तेदारों और मेरे जैसे बाहरी मेहमानों को पुरुषों वाले हिस्से में ठहराया जाता है।
यहाँ महिलायें घुंघट में रहती और पुरुषों से बातचीत करने से परहेज करती। पुरी यात्रा में मेरी किसी भी महिला से बातचीत सम्भव नहीं हो पाई और मै सामाजिक दृष्टी से इस क्षेत्र के एक बेहद जरूरी पक्ष को समझने से वंचित रह गया। इस प्रदेश की महिला साक्षरता 40 फीसदी से भी कम है (जनगणना २०११)।
यात्रा में हम सभी जातियों के लोगों से मिले। इनमें दलित वर्ग से आने वाले दो गाँवो के मजबूत व्यक्तित्व वाले विनम्र सरपंच, तथा राजपूत जाति के ऐसे ज़मींदार भी शामिल थे जो आज भी गांव में परिवारिक और जमीनी बखेड़े सुलझाते हैं। यहाँ जातिगत भेदभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था।
ओवरफ्लो से आई आबादी

डेडियावंगा और अहमदकोट गांव के पास हमें लूणी में पानी जमा हुआ दिखा। यह पानी कई खेतों में फैला हुआ था। दरसल यहाँ सड़क पर छोटे स्टॉप डैम जैसी संरचनाएं बनी हुई थी, जिनमें पानी रोकने और छोड़ने के लिए गेट भी लगे थे। पर देखरेख के आभाव में वे ख़राब हो गए थे। पानी बड़ी रफ्तार से एक छोटी सी पुलिया के रास्ते आगे निकल रहा था।
डेडियावंगा गांव के बुजुर्ग हाजी इस्माइल मीर खान (74) हमें वहीं मिलें। उन्होंने बताया कि, यह सारा पानी ओवरफ्लो का है, क्योंकि कुछ समय पहले यहाँ बना स्टॉप डैम टूट गया था। वैसे इतना पानी यहाँ पहली बार आया था। बहुत सारे खेत पानी में डूब चुके थे और खारे हो चुके थे। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इस बार नहर और लूणी मे ज्यादा पानी छोड़ा गया। जो खेत ज्यादा समय तक डूबे रहे वे दलदल बन गए, जिनका पानी जल्दी उतर गया उन पर पानी के वाष्पीकरण के बाद नमक की परत जम गई।
यहीं हमें हसन खान (40) बी भी मिलें। उन्होंने बताया कि, इस पुरे क्षेत्र की मिट्टी खारी है। कहीं-कहीं ऊपर की एक फीट परत मीठी और उपजाऊ है, पर उसके नीचे सब खारा है। वे बेरी या कुआँ खोदते है तो भी 10 फीट तक कुछ समय के लिए मीठा पानी मिलता है, पर धीरे-धीरे वह भी खारा हो जाता है। नीचे गहराई में भी खारा ही पानी है।
अहमदकोट गांव के हुसैन खान (37) इस बार पानी मिलने से खुश थे। इस बार उन्होंने अपनी पुरी 80 बीघा जमीन पर बुआई की थी। इससे पहले पानी नहीं होने से, हुसैन जी को अपने 15-16 सदस्यों वाले बड़े परिवार और पशुओं के साथ गुजरात की ओर जाकर मजदूरी करनी पड़ती थी।
अकेले सफ़र के अनुभव

एक पड़ाव के बाद मुझे अकेले ही यात्रा जारी रखनी पड़ी। यह मेरे लिए भावनात्मक रूप से मुश्किल था। दोबारा यात्रा शुरू करने जैसा था। पैदल चलते समय अगर कोई साथ होता है, तो यात्रा की कठिनाई थोड़ी कम लगती है, समय और दुरी आसानी से कटते हैं। कोई मुश्किल हो तो एक-दूसरे की मदद से उसका हल निकाला जा सकता है। अकेले चलते समय मुझे इन बातों का एहसास विशेष रूप से हुआ। परंतु मैंने अपनी एकल पदयात्रा नदी के अंदर से जारी रखी।
नहर के बाद के क्षेत्र यानी गांधव के उत्तर के इलाके में नदी मे पानी नहीं था। वहाँ नदी रेतीली और उसके किनारे बेहद चौड़े थे, जिन पर जोलीफोरा का भारी अतिक्रमण हो चूका था। साथ ही यहाँ ऐसी कुछ मरुस्थलीय झाड़ियां भी थी, जो पानी वाली लूणी में या उसके आसपास नहीं दिखी थीं।

यहाँ नदी किनारों के दोनों तरफ आधा से एक किलोमीटर तक जोलिफोरा की घनी झाड़ियाँ थी। उसके बाद बड़ी बाड़बंदी वाले खेत थे औ फिर सड़क। यात्रा के पहले हिस्से की तरह, मै इस सड़क पर आसानी से चल सकता था। लेकिन नदी से इतनी दूर चलने से मैं नदी को महसूस नहीं कर पा रहा था। इसलिए यहाँ से मैंने नदी के अंदर से चलना शुरू किया।
लेकिन नदी के अंदर चलना बहुत ही मुश्किल था। पैर रेत में घुटनों तक धंसे जा रहे थे और दूर-दूर तक कोई इंसान भी नजर नहीं आ रहा था। धूप मे चमकती नदी की सफ़ेद रेत आँखों मे बुरी तरह चुभ रही थी। यहाँ लूणी किसी रेत के समंदर जैसी लग रही थी। दूर-दूर तक रेत ही रेत नजर आ रही थी। कई बार लगा बस यहीं अपनी यात्रा समाप्त कर दूँ, इसके आगे बढ़ना असंभव है। पर मन में एक पत्थर की लकीर खींच रखी थी कि, किसी भी हाल में यात्रा पुरी करनी ही है। इसलिए आगे बढ़ता रहा।
काल की कठिनाई और महासगर से मन
अपनी इस यात्रा में 11 फरबरी का दिन मैं कभी नहीं भूल पाउँगा। इस दिन की यात्रा सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण थी, जिसने मेरी शरीरिक और मानसिक क्षमताओं की पूरी परीक्षा ली। मैं गादेवी गांव में दोपहर 12 बजे के आसपास पहुंचा। वहाँ पर रामदेवरा धर्मशाला के संतो ने स्वयं से भोजन और रात्रि के विश्राम का प्रस्ताव मेरे सामने रखा, लेकिन मैंने यह कह कर कि, “अभी पूरा दिन पड़ा है, और ज्यादा दुरी तय कर लूँगा” उनका प्रस्ताव नकार दिया। लेकिन आगे चलकर मेरा यह निर्णय मुझे बहुत मँहगा साबित हुआ।
अगले गांव बांटा में मैंने कुछ लोगों से रात्रि विश्राम की बात की, पर बात नहीं बनी। अब अगले गांव का रास्ता नदी के सहारे तय करने के आलावा कोई चारा नहीं था। यह रास्ता बहुत मुश्किल और भूलभुलैया जैसा था। इस दिन नासमझी और मज़बूरी में मैं कुछ ज्यादा ही पैदल चल गया। किसी न किसी दिन इस तरह की मुश्किल आने ही वाली थी, सो उस दिन आ गई। शाम ढल रही थी, अंधेरा बढ़ रहा था, ठंड भी बढ़ गई थी और नदी से बाहर निकलने का कोई रास्ता भी नहीं मिल रहा था। मैं बहुत थक चूका था।

आखिरकार बड़ी मुश्किल से मैं नदी से निकल कर सड़क पर आया। तभी पुराने मैसी ट्रैक्टर पर बैठे मास्टर जैसा राम जी से मुलाक़ात हुई। थोड़ी बातचीत तथा मेरा काम और उद्देश्य जानने के बाद उन्होंने स्वयं मुझे अपने घर भोजन और रात्रि विश्राम का न्योता दिया, जो मैंने सहर्ष स्वीकार लिया। मैं ऐसे ही प्रस्ताव की उम्मीद में था।
मास्टर जी को किसी काम से गुड़ामालानी जाना था तो वे मुझे अपने घर का रास्ता बता कर गुड़ामालानी की ओर बढ़ गए। उन्होंने फोन पर मेरे आने की जानकारी घरवालों को दे दी थी।गांव में 12-13 साल की एक स्कूली लड़की साइकिल चलाते हुए दिखी। मैंने उससे जैशा राम मास्टर जी का घर पूछा, तो उसने मुझे उसके पीछे-पीछे चलने को कहा। शायद वह मास्टर जी की छात्रा होगी। वह मुझे मास्टर जी के घर तक छोड़ कर चली गई।
घर पहुंचते ही मास्टर जी की पत्नि और दो बेटियां मुझ अजनबी को कुतूहल भरी नज़रों से देखने लगी। उनकी आँखों में द्वेष, डर या घबराहट नहीं थी, बल्कि स्वाभाविक ख़ुशी और अपनापन था। किसी बिन बुलाए मेहमान के लिए मन में इतना निस्वार्थ प्रेम और आदर, सचमुच सच्ची भारतीय संस्कृति इससे अलग क्या होगी। एक मुश्किल भरे दिन के बाद इतने सहज़ और सरल मेजबान मिलना बहुत ही सुखद अनुभव था।
मुझे हर जाति और आर्थिक पृष्ठभूमि के मेजबान मिले, सभी बहुत नेक और सरल। कईयों ने बिना कहे दोपहर के भोजन का प्रस्ताव दिया, तो कईयों ने स्वयं से रात्रि विश्राम का आग्रह किया। छास का एक गिलास खाली होते ही दूसरा भरना और दूसरे के बाद तीसरा! घी में तरबतर बाजरे का सुघरा एक के बाद उतने ही प्रेम से खिलाना… इतना सब एक अजनबी के लिए आजकल कौन करता है भला? मेरे लिए ये अनुभव किसी आजीवन पूंजी से कम नहीं।
लूणी: पानी नहीं पर कुछ और जरुर है

गांधव कलान का दक्षिणी क्षेत्र नहर के जल से सिंचित है, यहाँ जीरे के साथ-साथ रायड़ा, गेहूँ और आरंडी की फ़सलें ली जाती हैं, वहीं गांधव कलान के उत्तर में पालियाली गांव के बाद लूणी नदी का सारा इलाका नहर विहीन है। यहाँ किसानों को जीरा सिंचाई के लिए बहुत परिश्रम और भारी आर्थिक निवेश करना पड़ता है। मैं जब यहाँ पहुंचा तो मैंने देखा, यहाँ नदी में डीजल इंजनों की लंबी कतार लगी हुई थी, सैकड़ों डीजल इंजन चौबीसों घंटे ‘धुक-धुक’ की आवाज करते हुए चल रहे थे। यहाँ नदी में बस यही आवाज गूंज रही थी।
ये इंजन अपनी पुरी क्षमता से, इस बार बारिश में रिचार्ज हुई नदी के एक्विफर से आखरी बूंद तक पानी खींचने में लगे थे। पाइप से बहुत दूर-दूर तक खेतों में पानी पहुंचाया जा रहा था। खेत नदी से जितना दूर, उतनी ही लंबी पाइप लाइन। कोई-कोई पाइप लाइन तो दस किलोमीटर तक लंबी थी। इनका खर्चा भी उतना ही बड़ा था। और यह सब कुछ किया गया था सिर्फ जीरे की फ़सल के लिए। कुछ किसान इस इलाके में अनार और खजूर की खेती भी कर रहे हैं।
लेकिन लूणी के इस हिस्से में, सूखी नदी के तल में एक और मूल्यवान चीज़ छिपी है – तेल!
धान्दलावास के पास केयर्न इंडिया के क्रूड ऑइल और गैस निकालने के वेलपैड हैं। यहाँ से क्रूड और गैस निकाले जा रहे हैं। नगर और गुड़ामालानी में लूणी बेसिन के आसपास ऐसे 37 से अधिक वेलपैड चिन्हित किये गए हैं। कुछ स्थानीय किसान और पर्यावरण नदी प्रेमी यहाँ से क्रूड ऑइल निकालने का विरोध कर रहे हैं। वे इस मामले में अदालत तक जा चुके हैं, पर वहाँ उन्हें सफलता नहीं मिली।
इनमें से एक याचिका कर्ता, बाड़मेर के यशोवर्धन राठौर के अनुसार, तेल कम्पनियाँ क्रूड ऑइल निकालने में कई खतरनाक केमिकल्स का उपयोग करती हैं, बहुत सारे जहरीले केमिकल क्रूड के साथ भी निकलते हैं, जिन्हे तेल कम्पनियाँ नदी के आसपास खेतों में डंप करती हैं। बारिश में बहकर ये केमिकल नदी में पहुंच जाते हैं और मरुस्थल की जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं।
एक अनोखी नदी की अविस्मरणीय यात्रा

मेरा जन्म नदी के किनारे हुआ और मैंने अपने थोड़े से जीवन में कई नदियाँ देखीं। लेकिन लूणी उन सबसे अलग थी। बरसों सूखी रहने वाली लूणी में केवल सौभाग्य से किसी वर्ष बारिश का पानी आता है, वह भी मात्र कुछ समय के लिए। वह भी जल्द ही खारा हो जाता है, इसीलिए तो खारे पानी वाली इस अद्वितीय नदी को लूणी कहते हैं।
हमारी लूणी पदयात्रा की बात पर कई लोगों ने आश्चर्य जताया, कहा इस नदी में ऐसा क्या है जो कोई इसकी पदयात्रा करने की सोचे? आखिर इस दलदल भरी, सूखी और बंजर नदी में किसी को क्यों दिलचस्पी होगी। लूणी को लोग मरू गंगा या जीवन दायिनी तो कहते हैं पर उसके बारे में बात नहीं करते। यदि करते भी हैं तो बस, उसमें आई बाढ़ और बाढ़ में खोई जमीन की बात करते हैं। लूणी कोई ऐसी नदी नहीं जहाँ लोग धार्मिक संस्कार करने आएँ या सुबह-शाम टहलने जाएँ। इस नदी पर न कोई घाट है, ना कोई मंदिर, ना ही मस्जिद।
घर की याद
आखिरी पड़ाव से पहले, तीन दिन की पदयात्रा नदी में से ही जारी थी। चलते-चलते मेरे मन में एक ओर पिछले 10-11 दिनों की घटनायें घूमड़ रहीं थीं, वहीँ दूसरी ओर 14 वे दिन का बेसब्री से इंतजार था। घर की बहुत याद आ रही थी, इतनी कि लग रहा था अगर बस चले तो उड़ के घर पहुँच जाऊं।
यात्रा के आखिरी दिन जब में नदी पर आया तो मैंने एक दृश्य देखा। इस दृश्य ने मन को झकझोर दिया और घर की याद और भी आने लगी। एक माँ तड़कती धूप में अपने बच्चों के साथ सूखी, रेतीली नदी पार कर रही थी। एक बच्चा उसकी पीठ पर था तो दूसरी बच्ची उसके पीछे-पीछे, हाथ में झोला लिये चल रही थी।
मेरी माँ भी हमें इसी तरह बेतवा नदी पार कराती थी!

Satish Malviya is a Moving Upstream fellow who spent time walking along River Luni, as part of Veditum’s Moving Upstream Fellowship program along River Luni, that we co-hosted with the School of Public Policy, IIT Delhi, and was supported by Out of Eden Walk & A4Store. To read more about our Moving Upstream project, click here.
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Mohit Rao & Siddharth Agarwal mentored and guided the fellows. They have also edited and produced this piece with support from Parikshit Suryavanshi for editing. The Luni Fellowship has been held together in collaboration with Prof. Pooja Prasad.
This piece can be re-published (CC BY-NC-SA) with a line mentioning ‘This was originally published on Veditum’ and a link back to this page. In case of re-publishing, please alert asid@veditum.org
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Beautifully scripted and narrated
अच्छी पहचान दे गये नेहङ को बंधु “नाम से पहले जाती”
जिस किसी क्षेत्र में शिक्षा की कमी हैं वहां सभी नाम से से पहले जाती पुछते हैं पुरे भारत में,
नेताओ की नाकारी नहीं दिखी आजादी के दशको बाद भी ये क्षेत्र शिक्षा स्वास्थ्य जल और रोजगार के लिये
आज भी तरस रहा हैं…
ऐक कहावत हैं नेहङ में
नेहङ कांठो देशं पालु खावण हिरा खांण
अर्थात: नेहङ ईलाका देश को पालने वाला था खाने पिने की तो यहाँ हिरो की खाने हुआ करती थी ,
लेकिन जब देश को ईसे पालने की नौबत आई तो कुछ ऐसा हाल हुआ हैं